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बिहार में राहुल की बहार

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NNI.18अक्टूबर। (राहुल डबास) क्या राहुल गांधी यूपी की गाथा बिहार में भी दोहरा करते हैं। जैसे वहां उनकी की राजनीतिक शैली को देश में काफी सराहना मिली है, लेकिन इधर इसके कुछ पहलुओं की आलोचना भी हो रही है। बिहार में कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची में अवसरवादी और अपराधी तत्वों की एक जमात भी शामिल है। राहुल गांधी वहां चुनाव अभियान में तो दिखे पर, अपने स्तर से ऐसे तत्वों को टिकट दिए जाने का विरोध करते नहीं दिखे। दस साल पहले काफी मान-मनुहार के बाद जब राहुल ने राजनीति में आने और चुनाव में उतरने की घोषणा की थी, तो उन्हें गांधी-नेहरू वंश के एक और रंगरूट की तरह ही देखा गया था। पारिवारिक साख की रोटी खाने वाला एक और करिश्माई चेहरा।
नेहरू को छोड़ दें तो इंदिरा गांधी से लेकर संजय गांधी और राजीव गांधी से होती हुई सोनिया गांधी तक गांधी-नेहरू परिवार की वंशानुगत राजनीति करिश्मे के सहारे ही चलती चली आ रही थी। लेकिन इस परंपरा से परे हटकर राहुल गांधी ने अपने लिए एक नई राजनीतिक शैली ईजाद की। विपक्षी राजनेताओं पर कीचड़ उछालने की हद तक की जाने वाली बयानबाजी से वह हमेशा बचते रहे और बुरी तरह विभाजित भारतीय राजनीति में कई बार नई पीढ़ी की तरफ से एक सहमति का रास्ता बनाते हुए भी जान पड़े। बतौर जमीनी कार्यकर्ता राहुल की उपलब्धियां कुछ खास नहीं हैं, फिर भी आम लोगों के बीच उनके उठने-बैठने को अच्छी नजर से देखा गया। पारंपरिक कांग्रेसी शैली में रचे-बसे यूपी के कांग्रेस जनों ने शुरू में राहुल की राजनीति को एनजीओ के करीब पाया। उनमें से एक ने तो तीखे लहजे में यहां तक कहा कि स्कूल-सड़क बनवाने या लोगों के मरने-जीने में शामिल होने से पुण्य मिलता है, वोट नहीं मिलते।
लेकिन इसी उत्तर प्रदेश में पिछले आम चुनाव के बाद कांग्रेस को अर्से बाद दूसरे नंबर की पार्टी बनाकर राहुल गांधी ने साबित किया कि उनकी राजनीतिक शैली वोट पाने के लिहाज से भी ज्यादा बुरी नहीं है। राजनीतिक हलकों में यूपी के लोकसभा चुनाव नतीजों को चमत्कार की तरह लिया गया, लेकिन राहुल की शैली की वास्तविक परीक्षा बिहार और फिर यूपी के विधानसभा चुनावों में होनी है। खासकर फिलहाल जारी बिहार विधानसभा चुनावों में, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहचान भी अपनी साफ-सुथरी राजनीति और विकास के अजेंडे के लिए है। राज्य में अकेली कांग्रेस पार्टी ही यहां सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बिहार में एक नया सपना जगाने के लिए यह पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में युवा और अच्छी छवि वाले सक्रिय कार्यकर्ताओं की एक पूरी पांत को चुनाव में उतार सकती थी। लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस अभी तक न तो राज्य के भविष्य को लेकर कोई ठोस बात कह पाई है, न ही उसके चुनावी मंचों पर ऐसे उम्मीदवार नजर आए हैं, जिन्हें देखकर लोगों में कोई नई उम्मीद पैदा हो सके। राहुल जैसे संभावनाशील नेता से इस पिटे हुए सियासी रास्ते पर चलने की अपेक्षा नहीं की जाती।

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Comments (1)Add Comment
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written by Abhishek sharma, April 05, 2011
aagami chunavo me teen yuvraajo ka bhaivshya daanv per hai...
Rahul gandhee-congress
Varun gandhee-BJP
Akhilesh yadav-SP

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