नई दिल्ली. बीजेपी के एक नेता से बात हो रही थी। मैंने पूछा- अभी से आप लोग प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम क्यों नहीं घोषित कर देते? बीजेपी को एक चेहरा मिल जाएगा और रोज के झगड़े से भी निजात मिलेगी। उन्होंने कहा- आप सही कह रहे हैं। लोग सरकार के भ्रष्टाचार से ऊबे हुए हैं। मंत्री आपस में लड़ रहे हैं। सोनिया बीमार हैं। प्रधानमंत्री का सरकार पर नियंत्रण नहीं है। महंगाई आसमान पर है। इससे बेहतर मौका बीजेपी के पास नहीं हो सकता। एक चेहरा पूरी पार्टी में जान डाल देगा और लोगों के पास मनमोहन का एक विकल्प भी होगा।
मैंने पूछा, तो फिर दिक्कत क्या है? उनका कहना था कि कई दावेदार हैं। मैंने कहा, आरएसएस का डंडा चलेगा, सब ठीक हो जाएगा। फिर, जब कभी आप यह फैसला करेंगे, ये दिक्कत तो तब भी रहेगी। जितनी जल्दी हो, इस मसले को सुलझा लिया जाए। वह बोले, आसान होता, तो निपट गया होता। मैं उनकी राय से सहमत था। हालांकि वह जो कह रहे थे, वह अधूरा सत्य है। मामला सिर्फ व्यक्तियों का नहीं है। मामला विचारधारा का भी है। मोहन भागवत के आने के बाद से संघ ने अपनी विचारधारा में बुनियादी बदलाव करने का मन बना लिया है। इस दिशा में काम भी शुरू हो गया है। वह इस बात को लेकर चिंतित थे कि जिस हिंदुत्व को लेकर संघ चला था, वह 86 साल बाद भी हिंदू समाज को ग्राह्य नहीं है। वह कट्टरपंथ का पर्याय बन गया है। लोगों को अपने को हिंदुत्ववादी कहने में परेशानी होती है। यह तकलीफ कभी किसी मार्क्सवादी, वामपंथी, लेनिनवादी या माओवादी को नहीं ङोलनी पड़ी। इस पर संघ में चिंतन हुआ कि जिस हिंदुत्व को पूरे समाज को जोड़ना था, वह तोड़ने का प्रतीक हो गया। यह बात संघ प्रमुख को तो समझ में आ गई है। संघ के कुछ नेता भी इस सत्य को मानते हैं। वे चाहते हैं कि राष्ट्रवाद को केंद्र में रखकर संघ की विचारधारा में नई ऊर्जा का संचार किया जाए। लेकिन इसमें दो दिक्कतें हैं।
एक, संघ की पूरी लीडरशिप अब भी सरसंघचालक की इस राय से सहमत नहीं। दूसरी, कार्यकर्ताओं को भी इस बदलाव से जोड़ना आसान नहीं है। जो कार्यकर्ता या स्वयंसेवक बचपन से हिंदुत्व से जुड़ा रहा है, अब वह उस राह से अपने को कैसे अलग कर ले? हिंदुत्व तो उसकी प्राणवायु है। प्राणवायु से समझौता कैसे संभव है? विचारधारात्मक संगठनों के साथ ये परेशानी होती है। बीजेपी के अंदर की लड़ाई का एक बड़ा कारण यह वैचारिक संघर्ष भी है। यह सबको पता है कि लालकृष्ण आडवाणी संघ की हिंदुत्ववादी विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीक हैं। यही आडवाणी खुद इसको उदार बनाने के पक्षधर हैं। जिन्ना पर उनका बयान संघ की वैचारिक कश्मकश का सबसे बड़ा उदाहरण है। आडवाणी के बयान को संघ का हिंदुत्ववादी कैडर पचा नहीं पाया और उन्हें हिंदुत्व से दगा करने की सजा दी गई। उनसे पार्टी अध्यक्ष का पद छीन लिया गया। वर्ष 2004 में संघ के एक धड़े का मानना था कि वाजपेयी के शासन में बीजेपी अपनी मूल विचारधारा से भटक गई, इसलिए पार्टी के मूल समर्थकों ने उसका हाथ झटक दिया, जबकि पार्टी का बड़ा हिस्सा इस बात पर कायम था कि गुजरात दंगों की वजह से उदार हिंदू उससे दूर हो गया और पार्टी की लुटिया डूब गई। अशोक सिंघल और के सुदर्शन जैसे संघ के वरिष्ठ लोगों को वाजपेयी का यह तर्क रास नहीं आया और वाजपेयी और आडवाणी को दूसरी पंक्ति के नेताओं के लिए जमीन छोड़ने का फरमान सुना दिया गया। जिन्ना पर बयान आडवाणी की एक कोशिश थी संघ और बीजेपी को गुजरात के दंश से बाहर निकालने की। पर संघ इतनी जल्दी इतने बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं था।
वैचारिक विभ्रम और विकल्पहीनता ने संघ को एक बार फिर साल 2009 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के पास जाने के लिए मजबूर कर दिया। हार के बाद मंथन हुआ। सुधींद्र कुलकर्णी जैसे आडवाणी के राजनीतिक सलाहकार ने लिखा कि संघ को अपने को बदलने की जरूरत है। बदलते भारत के अनुरूप उदार होना होगा। संघ में मार मच गई। कुलकर्णी को बीजेपी छोड़नी पड़ी। आडवाणी को फिर शर्मसार होना पड़ा। नेता विपक्ष का पद उनसे ले लिया गया और सुषमा स्वराज को गद्दी दे दी गई। अध्यक्ष पद पर नितिन गडकरी जैसे संघ के करीबी को बिठा दिया गया। जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया, क्योंकि उन्होंने जिन्ना पर किताब लिखी थी।
पिछले एक साल में बीजेपी पहले से बेहतर हुई है। संसद के अंदर और बाहर विपक्ष की भूमिका को वह हमलावर तरीके से निभा रही है। उमा भारती और संजय जोशी जैसे संघ के प्रिय लोगों को बाहर से उठाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति से जोड़ दिया गया है। इस तरह, बीजेपी की किस्मत सबसे बड़े राज्य में संवारने की कोशिश की जा रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी का क्या करें? मोदी एक व्यक्ति का नाम होता, तो बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उसका समाधान खोज लेते। मोदी गुजरात हैं और गुजरात को आरएसएस हिंदुत्व की प्रयोगशाला मानता है। मोदी यानी आरएसएस की मूल विचारधारा। असली हिंदुत्व। केशव बलिराम हेडगेवार और गुरुजी गोलवलकर का हिंदुत्व। बदले संदर्भो में इस हिंदुत्व को ये कहकर धता नहीं बताया जा सकता कि हिन्दुस्तान तो आगे निकल गया है और असली हिंदुत्व पीछे रह गया है। मोदी को यह बात कचोटती है, जब वह प्रधानमंत्री की दौड़ में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को देखते हैं। मोदी की नजर में ये वो लोग हैं, जिन्होंने विचारधारा यानी हिंदुत्व के नाम पर कभी जिल्लत नहीं झेली। सुषमा स्वराज और जेटली की छवि बीजेपी में होने के बाद भी सांप्रदायिक नेता की नहीं है, जबकि मोदी कितनी भी सद्भावना कर लें, उन्हें कोई आधुनिक नेता नहीं मानता।
नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व की फसल काटकर राज भी किया है और इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकाई है। ऐसे में, असली हिंदुत्व इतनी आसानी से हार मान ले, ये कैसे संभव है। उसे ज्यादा कुंठित किया गया, तो वह नाराज भी होगा और अनुशासनहीन भी। जरूरत पड़ी, तो वरिष्ठ लोगों की बेअदबी भी करेगा और हिंसक भी होगा। ऐसे में, मैं इस बात से सहमत हूं कि मामला काफी पेचीदा है। हल वक्त के साथ ही निकलेगा और तब तक बीजेपी में बिसात बिछी रहेगी।
बीजेपी की महाभारत में मोदी का स्थान ?




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