Monday, Apr 21st

Last update11:53:14 AM GMT

You are here:: मुद्दा

मुद्दा

अनशन-आंदोलन और आपातकाल...

E-mail Print PDF

इसे जून का जादू कहें या जन के जज्बात लेकिन जून का महीना है, कांग्रेस की सरकार, आवाम की हालत और आपातकाल के हालात सभी समान नज़र आते हैं...। महज़र किरदार बदल गए पर कहानी नहीं बदली। जय प्रकाश नारायण का ज़ज़्बा और लोहिया के लोग अब अन्ना के अनशन और रामदेव के सत्यागृह में बदल गए हैं। आज अन्ना को RSS का मुखौटा कहा जाता है कभी जेपी के नक्सिन का मास और CIA का एजेंट कहा गया था..। दिल्ली के प्रेस कल्ब में अन्ना आवाहन करते है कि लोकपाल के लिये मरना मंज़ूर है और 1974 में पटना से जेपी जवाब देते थे भारत में रुसी क्रांति के वास्ते पुलिस और सेना का सरकार का साथ छोड़ना होगा..।

AddThis Social Bookmark Button

कर्नाटक से खुश नहीं हैं आडवाणी

E-mail Print PDF

 

एनएनआई डेस्क


चेन्नई. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रविवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की परोक्ष रूप से आलोचना की। लेकिन भाजपा या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) शासित अन्य राज्यों के प्रदर्शन की तारीफ की।

AddThis Social Bookmark Button

देश को फिलॉस्फर मनमोहन की नहीं, पॉलिटिकल मनमोहन की दरकार है

E-mail Print PDF

सखि सैंया तो बहुते कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है। वर्ष 2009 के चुनाव से ही महंगाई डायन खाए जा रही है। मौजूदा हफ्ते में इसका आंकड़ा 18 प्रतिशत से भी आगे निकल गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु फरमा रहे हैं कि सरकार के पास इससे निपटने का कोई उपाय नहीं है। और ये उस वक्त कहा जा रहा है, जब देश की कमान एक अर्थशास्त्री के हाथों में है।

AddThis Social Bookmark Button

हम जानते हैं कौन “दल्ला” है और कौन “दल्लागिरी” कर रहा है

E-mail Print PDF

नया-नया पत्रकार बना था। दोस्त की शादी में गया था। दोस्त ने अपने एक ब्यूरोक्रेट रिश्तेदार से मिलवाया। अच्छा आप पत्रकार हैं? पत्रकार तो पचास रुपये में बिक जाते हैं। काटो तो खून नहीं। क्या कहता? पिछले दिनों जब राडिया का टेप सामने आया तो उन बुजुर्ग की याद हो आई। बुजुर्गवार एक छोटे शहर के बड़े अफसर थे। उनका रोजाना पत्रकारों से सामना होता था। अपने अनुभव से उन्होंने बोला था। जिला स्तर पर छोटे-छोटे अखबार निकालने वाले ढेरों ऐसे पत्रकार हैं जो वाकई में उगाही में लगे रहते हैं। ये कहने का मेरा मतलब बिलकुल नहीं है कि जिलों में ईमानदार पत्रकार नहीं होते। ढेरों हैं जो बहुत मुश्किल परिस्थितियों में जान जोखिम में डालकर पत्रकारिता कर रहे हैं। इनकी संख्या शायद उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये। ऐसे में राडिया टेप आने पर कम से कम मैं बिलकुल नहीं चौंका।

AddThis Social Bookmark Button

देश में 295 बाघो का इज़ाफा

E-mail Print PDF

लगभग नौ करोड़ रुपए के खर्च से वनविभाग के 4.76 लाख कर्मचारियों ने अनुमान लगाया है कि भारत में बाघों की संख्या पिछले चार साल में 1411 से बढ़कर 1706 हो गई है। इस तरह बाघों की संख्या में 295 की वृद्धि हुई है। ये आंकड़े दिल्ली में आयोजित बाघ संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जारी किए गए हैं।

AddThis Social Bookmark Button

Page 8 of 10